सारे जगत में देखो ,मचा है हाहाकार
त्रासदी ने लिया है विशाल आकार !
यूँ,न करो कुदरत से छेड़छाड़,
भोगने पड़ेंगे तुम्हे अत्याचार !
प्रकृति ने, मचाया है जलजला,
नज़र गयी जिधर हर ओर चीत्कार!
स्वभाव मानव का देख विकराल ,
अम्बर भी बरसाने लगा अंगार !
जान जो,अदिति है जिसकी आभा ,
आओ,सब मिल करें धरा का श्रृंगार !
पहनाएं इसे पर्यावरण का हार !!
*****नीता परिहार *****

