नये ज़माने का अजब दस्तूर है
बेगाने अपने हुए,और अपने दूर है
कर दिया हर एक रिश्ता दरकिनार
किस नशे में आज इन्सां चूर है
कौन सुनता फिर गरीबों की वहाँ,
हुक्मराँ खुद ही यहां मगरूर है.
मिल रहे तमगे किसी को और, इक,
बच्चा यहां पर आज भी मजदूर है .
बात तो करते हैं सब देखो बड़ी,
ज़िन्दगी जीने को पर, मजबूर है
मुल्क़ में खुशहाली की किसको पडी,
देखना सबको ही अपना नूर है..
*****नीता परिहार *****
बेगाने अपने हुए,और अपने दूर है
कर दिया हर एक रिश्ता दरकिनार
किस नशे में आज इन्सां चूर है
कौन सुनता फिर गरीबों की वहाँ,
हुक्मराँ खुद ही यहां मगरूर है.
मिल रहे तमगे किसी को और, इक,
बच्चा यहां पर आज भी मजदूर है .
बात तो करते हैं सब देखो बड़ी,
ज़िन्दगी जीने को पर, मजबूर है
मुल्क़ में खुशहाली की किसको पडी,
देखना सबको ही अपना नूर है..
*****नीता परिहार *****