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Monday, 16 February 2015

दस्तूर

नये ज़माने का अजब दस्तूर है
बेगाने अपने हुए,और अपने दूर है

कर दिया हर एक रिश्ता दरकिनार
किस नशे में आज इन्सां चूर है

कौन सुनता फिर गरीबों की वहाँ,
हुक्मराँ खुद ही यहां मगरूर है.

मिल रहे तमगे किसी को और, इक,
बच्चा यहां पर आज भी मजदूर है .

बात तो करते हैं सब देखो बड़ी,
ज़िन्दगी जीने को पर, मजबूर है

मुल्क़ में खुशहाली की किसको पडी,
देखना सबको ही अपना नूर है..



*****नीता परिहार *****

खामोशियाँ


















खामोशियाँ भी बोलती है
दूर होते हुए,
कोलाहलों में भी
मौन की गूंज
अल्फाजों में सुनाई देती है,
तुम्हारी उदासी को,
ख़ुशी को,मौसम से
हमेशा बातें करते सुना
दिल की बातें दिल तक
पहुंचकर ही शुकून
पातीं हैं.……
देखो,चलीं बसंती हवाएं
चारों तरफ खिले
"नारंगी पलाश "
अभी अभी
तुम्हें कहते सुना
लग रहा न जंगल में
आग लगी।
*****नीता परिहार *****
१६ /२ /२०१५