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Friday, 30 May 2014

बरसात
















क्यूँ चले आये बादल बरसते हुए
याद आयेंगे अब पल गुजरते हुए

रात है महकी महकी हुई सी अभी
बिछ गये फूल राहों में झरते हुए

बह गई बूँदें पलकों पे ठहरी हुई
बारिशे हुई यूँ  कुछ लरजते हुए

बहकी बहकी सी बातें हुई रात भर
सुबह भी हो गई फिर चहकते  हुए

पी निगाहों से थोड़ी सी मय झूम के
घर चली आई नीता बहकते हुए ..............


*****नीता परिहार *****






Thursday, 22 May 2014

यादों की बारिश
















कल रात
आयी थी 
यादों की बारिश 

वो आँगन में सोना 
संग दादा का बिछौना 
घर पर बस तब 
एक ही पंखे का होना 

कल रात आयी थी 
यादों की बारिश 
गीत माला सुनना 
दादी का लोरी सुनाना 

वो भाग कर 
लुका छिपी में 
मुंडेर पर आना 
दोपहरी भर खेलना 

चोरी छिपे बैठ कर 
इमली खाना और 
खरबूजों की
दावतें उड़ाना 

वो बारिश की बूंदे 
और बहते पानी में
इठलाते हुए
कश्तियाँ चलाना 

कल रात आयी थी 
यादों की बारिश 
अमराई जाना 
फूलों का चुराना 

अब आँगन रहे 
न अमराई 
बचपन को किताबों में
गंवाना ,न रूठना न मनाना 

बस अब रह गया यही
जीवन की आपाधापी 
सबके हिस्से में आना
किसी  के घर आना न जाना .........:)

*****नीता परिहार *****












Sunday, 11 May 2014

फितरत



















आज प्यार में धोखा कितना आसान हो गया
प्यार को निभा गया जो वो अहसान हो गया

तबियत घबराती है अब इन्सां को देखकर 
फितरत बदलकर वो आज शैतान हो गया

खुदा भी पूछे अब तुझे क्या इंसान हो गया
खुशियों को भूला आज परेशान  हो गया

जाने क्या हवा लगी या नजर जमाने को
आदमी चलती फिरती दूकान हो गया !!
       
*****नीता परिहार *****



Wednesday, 7 May 2014

तन्हाई
















ढल गया चाँद आज फिर तन्हा
दिल का टूटा है साज़ फिर तन्हा

कुछ भी बाकी रहा न कहने को
कैसे छुपता ये राज़ फिर तन्हा

चाँद तकता है आज फिर मुझको
क्यूँ मुझे हो न नाज़ फिर तन्हा

छीन कर चैन और दिल का सुकूँ
कर दिया मुझको आज फिर तन्हा

गीत कोई दिल से जब गाओगे
अब न होगी आवाज़ फिर तन्हा


*****नीता परिहार *****


Saturday, 3 May 2014

राजनीती

इन दिनों निकली
चुनाव की रैली है
जिधर देखो उधर
अराजकता फैली है
देश की यहाँ
किसको  पड़ी है
सबकी मानसिकता है
मैली है
बद-जुबानी तो देखो
जैसे बुरा न
मानो होली है
राई का पहाड़
बनाने का हुनर
कोई इनसे सीखे
राजनेता और मिडिया
जैसे दामन और चोली है
अब गन्दी हो चली
राजनीति से
कितने जवानो ने
खाई गोली है
इन संवेदनहीन नेताओं
न जाने
कितनी टोली है
उखाड़ फेकों अब
इन्हें जड़ों से
इनके आगे जनता
बहुत रो ली है
 ***नीता परिहार ***