ढल गया चाँद आज फिर तन्हा
दिल का टूटा है साज़ फिर तन्हा
कुछ भी बाकी रहा न कहने को
कैसे छुपता ये राज़ फिर तन्हा
चाँद तकता है आज फिर मुझको
क्यूँ मुझे हो न नाज़ फिर तन्हा
छीन कर चैन और दिल का सुकूँ
कर दिया मुझको आज फिर तन्हा
गीत कोई दिल से जब गाओगे
अब न होगी आवाज़ फिर तन्हा
*****नीता परिहार *****
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