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Wednesday, 29 October 2014

एक नदी ने कहा

     नदी ने कहा

कितनी,गहरी थी मैं !

मानव ने  संहार किया,

अब उथली हूँ मैं !

छेड़ा है तुमने मुझको ,

अब आक्रोश में रहती हूँ मैं !

शीतल झरने सी बहने वाली ,

अब सूख चली हूँ मैं !

चंचल सी कल कल करने वाली

जलजला मचा रही हूँ मैं !

और इंतज़ार अब न करवाना ,

रक्षक बनकर मेरे आना।

तुम मुझसे हो, तुमसे हूँ मैं



*****नीता परिहार *****












Monday, 27 October 2014

रिश्तों की भीड़ में ,

खुद को भुला दिया !

जा चुके थे लोग ,

देखा ,जब होश

आया हमें !

रिश्तों को बना कर खेल

जुआरी बन बैठे लोग

नफ़ा नुकसान की

बिछा चौपड़ ,

रिश्तों का दाँव लगा बैठे !

हिमाकत बस हमारी

इतनी सी

सोचा ज़रा बस

अपने लिए

अपनों  ने हमें

दुश्मन बना  लिया  !!

*****नीता परिहार *****

Wednesday, 22 October 2014

रिश्तें

गुजरती हूँ ज़र्ज़र हुए ,

दिल के गलियारे से कभी

जहाँ गुज़ारे थे चंद रोज़ कभी !

मिलते है लम्हात,कुछ बिखरे

तो कुछ संभले हुए,

कुछ मीठे शर्बत हुए

कुछ खारे समन्दर !

मिला एक लम्हा ज़मी पर,

सिसकता सा !

चाहा था उठाना मगर

भारी था रिश्तों पे ,

अहम का जो मारा निकला

टूट कर भी रूहानी रिश्तें ,

दिल में जिंदा रहा करते है !

हर ख़ुशी में, थोड़ी टीस

दिया करते है !

भुला देने की जिद में ,

मशरूफियत में भी

याद रहा करते है !

*****नीता परिहार *****