नदी ने कहा
कितनी,गहरी थी मैं !
मानव ने संहार किया,
अब उथली हूँ मैं !
छेड़ा है तुमने मुझको ,
अब आक्रोश में रहती हूँ मैं !
शीतल झरने सी बहने वाली ,
अब सूख चली हूँ मैं !
चंचल सी कल कल करने वाली
जलजला मचा रही हूँ मैं !
और इंतज़ार अब न करवाना ,
रक्षक बनकर मेरे आना।
तुम मुझसे हो, तुमसे हूँ मैं
*****नीता परिहार *****
कितनी,गहरी थी मैं !
मानव ने संहार किया,
अब उथली हूँ मैं !
छेड़ा है तुमने मुझको ,
अब आक्रोश में रहती हूँ मैं !
शीतल झरने सी बहने वाली ,
अब सूख चली हूँ मैं !
चंचल सी कल कल करने वाली
जलजला मचा रही हूँ मैं !
और इंतज़ार अब न करवाना ,
रक्षक बनकर मेरे आना।
तुम मुझसे हो, तुमसे हूँ मैं
*****नीता परिहार *****
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