रंग बिरंगे स्वप्न बुने थे,
हरे लाल ,कुछ नीले पीले,
फूलों और तितलियों जैसे,
कुछ उजास की भोर सरीखे,
शाम की कुछ सिन्दूरी धूप से,
ओस की बूंदों पर थे बिखरे,
झिलमिल करते रंगों को ही
मैंने जीवन माना था........
तुमसे मिलने के पहले
कब जीवन के रंगों को जाना
कहाँ समझ पाई थी प्रियतम
प्रेम का ये अनमोल खज़ाना
खुद में ही मुखरित होने को
मैंने जीवन माना था..
मैंने जीवन माना था..
*****नीता परिहार *****
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