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Monday, 21 September 2015

जीवन



 













रंग बिरंगे स्वप्न बुने थे,
हरे लाल ,कुछ नीले पीले,
फूलों और तितलियों जैसे,
कुछ उजास की भोर सरीखे,
शाम की कुछ सिन्दूरी धूप से,
ओस की बूंदों पर थे बिखरे,
झिलमिल करते रंगों को ही
मैंने जीवन माना था........

तुमसे मिलने के पहले
कब
जीवन के रंगों को जाना
कहाँ समझ पाई थी प्रियतम
प्रेम का ये अनमोल खज़ाना
खुद में ही मुखरित होने को
मैंने जीवन माना था..
मैंने जीवन माना था..
*****नीता परिहार *****

Monday, 3 August 2015

यादों में















जहाँ पहली बार मिले थे हम 
वो राह अब भी याद है
रोशन हुआ था जब समां
रोशनाई अब भी याद है
कहाँ से कहाँ ले आई जिंदगी
वो बेवफाई अब तक याद है
छोड़ कर राह में जाना तेरा
वो तन्हाई अभी तक याद है
जिक्र क्या करूँ मैं तेरा तेरी 
 साफगोई अब भी याद है

 *****नीता परिहार *****













Monday, 20 July 2015

उन्नति
















सुनो, तरक्की की राह
पर बढ़ते चले
 जाना तुम !

हर रोज़ इबादत में उसकी
 एक दिया जरुर
 जलाना तुम !

उन्नति के मद में
कहीं मगरूर न हो
जाना तुम!

भुला कर मुझको
मसरूफियत में अपनी 
खुद को भी  भूल न
 जाना तुम !

बढ़ते कदम थक कर
 थम जाएँ कभी
बस एक बार याद
मुझको कर लेना तुम !

*****नीता परिहार *****











Monday, 6 April 2015

बंधन

  ये रूहों का ही तो बंधन है
  जाने कितने जन्मों
  से मिल रहे हम। ।
  ऐसी क्या बात थी
  चाहे भी तो जुदा
   न हुए हम.।
  मुश्किल थी बड़ी
  बिछड़े थे जब
  जमाने से हम। ।
 न तुझको न मुझको
 ही पता था
 इस तरह मिलेंगे हम.।
 वक्त का चक्र
 तो चलता ही रहेगा
 दो जिस्म
मगर एक जान
रहेंगे हम.…






Wednesday, 25 March 2015

मुक्तक

चार कदम इनकी ओर बढ़ा कर तो देखो
एक नजर इनकी ओर उठा कर तो देखो
खिल जायेगी इनकी जिंदगी  फूलों सी
एक बार इनको गले से लगा कर तो देखो 

Sunday, 15 March 2015

रंग बदलते रिश्ते






















रिश्तों को महकते देखा है, हर रंग घुमड़ते देखा है. दिल में रहता था प्यार कभी, नफ़रत में बदलते देखा है. ऊंचे ऊंचे कद वालों का, ईमान भी गिरते देखा है महफ़िल में भी अक्सर उनको, तन्हा ही तड़पते देखा है. मुस्कान लबों पे आई तो, रूहों को मचलते देखा है. जब जब मैं घिरी हूँ मुश्किल में, अपनों को हँसते देखा है. क्या बात करें दुनिया की अब, तुमको को भी बदलते देखा है कुछ देर तलक वो साथ चले, फिर उनको बिछड़ते देखा है

*****नीता परीहार *****

Thursday, 12 March 2015

तन्हाई


हम तुम से रूठे रहे
यूँ  तुम अब  मनाने से रहे

रात गुजारी राह में तेरी
घर तुम अब आने से रहे

रात कट गई आंसू बहते रहे
तुम हमें अब बहलाने से रहे

चले जाओ  दूर चाहे तुम
हम तुम्हे अब  भुलाने से रहे

चाहे लगाओ  गुहार कितना
 हम दिल अब लगाने से रहे
*****नीता परिहार *****

Wednesday, 11 March 2015

बेबसी

मेरे लिए तुम्हारा
बेख्याली , बेगानगी (indifference)
बेपरवाह ,बेज़ार
होना पसंद आया
मुझे। ……
बदले में यही सब
बेहिसाब दूंगी तुम्हे
महसूस करोगे
उस  दिन
मुझे। .............
बेइख्तियार हो के (असहाय)
रहेगा दिल तुम्हारा
बेकरार होकर
मिलने आओगे
मुझे। ………
 बेगुनाह ,बेकसूर
थी  मैं ,किस
बात की बेरुखी दी
मुझे। …………
अब बेखुदी में (senselessness )
जियो तुम
भुला कर
मुझे। ……
भूली बिसरी यादों में
एक घडी बेख्वाबी की (sleeplessness )
देखना तुम
मुझे……।
हाँ फिर भी कहूँगी
बेपनाह (extreme )मोहब्बत है
 मुझे। ……।
*****नीता परिहार *****






Tuesday, 10 March 2015

मुक्तक


















आगे आगे राधा चली पीछे चले कान्हा,
बोली राधा कान्हा,मेरे पीछे नही आना
कान्हा बोले ,हंस कर मैं जाऊँगा कहाँ ?
दिल में मेरे बसी हो तुम कहीं नही जाना।।
*****नीता परिहार *****

"विडालगति छंद"




कान्हा तू काहे चोरी चोरी हांडी फोड़े,काहे माँ के पीछे से झांके जाए
झांके जाये राधा को तू क्यों कान्हा जोरा जोरी से पीछे पीछे काहे  जाए
पीछे पीछे काहे जाए कान्हा के साथी ग्वाला  राधा रानी झूला झूले जाए
राधा रानी झूला झूले कान्हा  यूँ ही झूला झूलाये आँखों में देखा जाए


Tuesday, 3 March 2015

होली

















होली आई तो सखी … गाल हो गये लाल 
आज खूब  हो रही ….... मस्ती और धमाल 
मस्ती और धमाल …भांग की खाई गुझिया 
गुल है सारे फ्यूज़ …गोल लगती है दुनियां 
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बात बात में हो रही ....रंगों भरी ठिठोली 
बिन पिचकारी खेलती …शब्दों के संग होली 
शब्दों के संग होली …याद है सब ऐसे ही 
खेली थी उस साल सदा खेलूं वैसे ही ...
*****नीता परिहार *****:)

Monday, 16 February 2015

दस्तूर

नये ज़माने का अजब दस्तूर है
बेगाने अपने हुए,और अपने दूर है

कर दिया हर एक रिश्ता दरकिनार
किस नशे में आज इन्सां चूर है

कौन सुनता फिर गरीबों की वहाँ,
हुक्मराँ खुद ही यहां मगरूर है.

मिल रहे तमगे किसी को और, इक,
बच्चा यहां पर आज भी मजदूर है .

बात तो करते हैं सब देखो बड़ी,
ज़िन्दगी जीने को पर, मजबूर है

मुल्क़ में खुशहाली की किसको पडी,
देखना सबको ही अपना नूर है..



*****नीता परिहार *****

खामोशियाँ


















खामोशियाँ भी बोलती है
दूर होते हुए,
कोलाहलों में भी
मौन की गूंज
अल्फाजों में सुनाई देती है,
तुम्हारी उदासी को,
ख़ुशी को,मौसम से
हमेशा बातें करते सुना
दिल की बातें दिल तक
पहुंचकर ही शुकून
पातीं हैं.……
देखो,चलीं बसंती हवाएं
चारों तरफ खिले
"नारंगी पलाश "
अभी अभी
तुम्हें कहते सुना
लग रहा न जंगल में
आग लगी।
*****नीता परिहार *****
१६ /२ /२०१५



Tuesday, 27 January 2015

हरेक बात की अब हद्द  हो गई
बात न करुँगी  अब जिद हो गई

दिल में मेरे अब खलिश हो गई
तुझसे मेरी अब रंजिश हो गई 

Sunday, 11 January 2015

क्षणिकाएं

कड़ाके की ठण्ड में
सडको पर
सिग्नल पर
कार के पास दौडती
दो रोटी के लिए
हाथ फैलाती जिन्दगी
कभी रोती
कभी मुस्काती
गुनगुनी ताप लिए
कब नया दिन
निकलेगा।
***नीता परिहार ***