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Saturday, 30 November 2013

आज फिर दिल किया

आज फिर दिल किया

अतीत के  गलियारे से

होते हुए घर के उस आंगन तक पहुंची

जहाँ मुख्य द्वार तक जाने है रास्ता

दोनों ओर बनी है बड़ी बड़ी क्यारियाँ

जहाँ रोपे  है फूलों के कुछ बीज नये

गुलदावदी ,पीली ,सफेद ,मेंहरुन

भीनी भीनी महक लिए खिली है बेसुमार

गेंदे के फूलों की जैसे लगी है भरमार

डहलिया ,और गुलाब की आई है बहार

सूरजमुखी तो जैसे इंतज़ार है नवदिन का

माँ की आवाज़ सुन गलियारे से बाहर आई

बड़ा ही दुखद रहा जाना वहां

आज जब रूककर देखती हूँ

तो कुछ भी नही रहा यहाँ

आँगन तो अब रहा नही

बड़ा सा पक्का मकान बन गया

घर में रहने के लिए अब नही कोई

संयुक्त परिवार एकल हो गया

और हम सब हो गये अकेले  .............नीता






Sunday, 17 November 2013

सुनहरी धूप



















मैं अलसाई सी

हौले हौले दबे पाँव

उठकर आई जब

दस्तक दी तुमने तब

कोहरे की शाल ओढे

शाल में हलकी धूप  की

सुनहरी किरणों की किनारी

पर ओंस की बूंदे जैसे

सितारे हो टाँके

हौले से पग बढ़ाकर

अन्दर आती धूप   से

जैसे रास्ते हुए रौशन

सुनहरा सवेरा

और गुनगुनाती  धूप

साथ लेकर आये तुम

गुनगुनाते ताप में

हाथ सेंकते हुए

जाने कहाँ खो गई

हाथ में चाय का

प्याला देख जब

आवाज़ दी तुमने

सुनो, चाय तुम्हारी

ठंडी हो गई

चौंक कर देखा जब

 धूप  खिलकर

चमचमा रही थी.

और तुममे

अपने होने का अहसास .....:)

  *नीता *


मुक्तक

                  मुक्तक













मौसम हो गया बदलकर रूमानी
चेहरा हो गया खिलकर नूरानी
था इंतज़ार हमको इनका कब से
लो आई मुस्कुराकर ऋतुओं की रानी
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कल रात स्याह काली और गहरी थी बहुत
ख्वाब में भोर की किरणें सुनहरी थी बहुत
क्या हुआ गर अँधेरे तुम में नजर नहीआये
आँख जब खुली तो पाया नींद प्यारी थी बहुत
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जीवन में आये कुछ यादगार पल
जो बनकर जियेंगे हमेशा सदाबहार पल
सब तेरे रहमतों की रहगुज़र है
की आते रहेंगे हर मौसम खुशगवार पल
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ठन्डे झोंखे आये है उस पार से
खिला है दिल बस उनके प्यार से
यूँ तो मौसम हुआ खुशगवार है
खिला  है नूर  फिजा में बहार से
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चाहती थी पंख फैला उड़ना परिंदा होकर
 मानव रह गया अब सिर्फ दरिंदा होकर
 न पता था बुलबुल बन कैद हो जाउंगी
हिम्मत से बढ़ आगे न जी शर्मिंदा होकर

      *नीता परिहार *
  

Sunday, 10 November 2013

नसीब



















प्यार के ख़त उसे ही मैं लिखता गया
वक्त भी जैसे मानो थमता गया ..........

मैं सिसकता रहा आँख जब ये खुली
ख्वाब में रोज़ मैं तुमसे ही मिलता रहा

एक बुत को तराशा बहुत प्यार से
ख़ूबसूरत हो इतनी की तकता गया

चाह थी दिल में देखूं तुम्हे रात दिन
तुम मिली ना मैं दर दर भटकता रहा

था नसीबों में मेरे मिला वो मुझे
वो ही वो मेरे जीवन में बसता रहा...........*नीता परिहार *

Saturday, 9 November 2013

तेरा श्रृंगार




हे ईश्वर इस धरती का श्रृंगार

जो तुमने किया अलंकृत

अलौकिक दृश्यों  से

कल कल करते झरनों से

करतें है तुझको जल अर्पण

सृष्टि  में खिले फूल अनेक

हवा में घोलते खुशबू

पेड़ झुके से करते समर्पण

पक्षियों का कलरव

जैसे मंदिरों में बजती घंटियाँ

सूरज की किरणें जैसे

आरती का थाल

आसमान के माथे पे

सूरज का सिंदूरी टिका है चमके

हर रात चाँद है दमके

है ना कितना सुन्दर

तेरा श्रृंगार ....................

*****नीता परिहार *****

Thursday, 7 November 2013

तेरा साथ













रहूँ मैं हर पल साथ तेरे ऐसी कोई दरकार नही

कर भरोसा इतना की पल भर भी तुझे भुला नही..

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कमी नही रहमतों की तेरी
ज़रूरत में दोस्त बन चला आया ...

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रहमतों ने तेरी. जीना सीखा दिया
गमों में भी हमको हँसना सीखा दिया
यूँ तो अश्क आँखों में पहले भी रहा करते थे
तुमने अश्कों को मोती बना पिरोना सीखा दिया

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                *नीता परिहार *