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Sunday, 17 November 2013

सुनहरी धूप



















मैं अलसाई सी

हौले हौले दबे पाँव

उठकर आई जब

दस्तक दी तुमने तब

कोहरे की शाल ओढे

शाल में हलकी धूप  की

सुनहरी किरणों की किनारी

पर ओंस की बूंदे जैसे

सितारे हो टाँके

हौले से पग बढ़ाकर

अन्दर आती धूप   से

जैसे रास्ते हुए रौशन

सुनहरा सवेरा

और गुनगुनाती  धूप

साथ लेकर आये तुम

गुनगुनाते ताप में

हाथ सेंकते हुए

जाने कहाँ खो गई

हाथ में चाय का

प्याला देख जब

आवाज़ दी तुमने

सुनो, चाय तुम्हारी

ठंडी हो गई

चौंक कर देखा जब

 धूप  खिलकर

चमचमा रही थी.

और तुममे

अपने होने का अहसास .....:)

  *नीता *


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