मैं अलसाई सी
हौले हौले दबे पाँव
उठकर आई जब
दस्तक दी तुमने तब
कोहरे की शाल ओढे
शाल में हलकी धूप की
सुनहरी किरणों की किनारी
पर ओंस की बूंदे जैसे
सितारे हो टाँके
हौले से पग बढ़ाकर
अन्दर आती धूप से
जैसे रास्ते हुए रौशन
सुनहरा सवेरा
और गुनगुनाती धूप
साथ लेकर आये तुम
गुनगुनाते ताप में
हाथ सेंकते हुए
जाने कहाँ खो गई
हाथ में चाय का
प्याला देख जब
आवाज़ दी तुमने
सुनो, चाय तुम्हारी
ठंडी हो गई
चौंक कर देखा जब
धूप खिलकर
चमचमा रही थी.
और तुममे
अपने होने का अहसास .....:)
*नीता *

No comments:
Post a Comment