प्यार के ख़त उसे ही मैं लिखता गया
वक्त भी जैसे मानो थमता गया ..........
मैं सिसकता रहा आँख जब ये खुली
ख्वाब में रोज़ मैं तुमसे ही मिलता रहा
एक बुत को तराशा बहुत प्यार से
ख़ूबसूरत हो इतनी की तकता गया
चाह थी दिल में देखूं तुम्हे रात दिन
तुम मिली ना मैं दर दर भटकता रहा
था नसीबों में मेरे मिला वो मुझे
वो ही वो मेरे जीवन में बसता रहा...........*नीता परिहार *

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