हे ईश्वर इस धरती का श्रृंगार
जो तुमने किया अलंकृत
अलौकिक दृश्यों से
कल कल करते झरनों से
करतें है तुझको जल अर्पण
सृष्टि में खिले फूल अनेक
हवा में घोलते खुशबू
पेड़ झुके से करते समर्पण
पक्षियों का कलरव
जैसे मंदिरों में बजती घंटियाँ
सूरज की किरणें जैसे
आरती का थाल
आसमान के माथे पे
सूरज का सिंदूरी टिका है चमके
हर रात चाँद है दमके
है ना कितना सुन्दर
तेरा श्रृंगार ....................
*****नीता परिहार *****

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