ये बरिश की बूंदें जब भी बरसती है ...... ये आँखे इंतज़ार में तेरे तरसती है ........... मन के आंगन में साथ अपने यादों के मोती लिए आती है .......... अश्क जब कोरों में बूंद बन झिलमिलाते है विरह में तेरे जिन्दगी जीने को मजबूर हुए जाती है ......... ये गुजारिश है तुमसे अबकी जब तुम जाना संग अपने ये सिली यादें भी ले जाना ले जाना वे सपने भी जिन्हें देख अब भी अँखियाँ लरजती है ........ *****नीता परिहार*****
पगडण्डी से होते हुए
पहुंचकर चौराहे पर
मंजिल दूर ही सही
भटक न जाना तुम
राह में कहीं डर कर
अटक न जाना तुम
कटीली ,पथरीली
राहों पर चलकर
मंजिल को पा ही
जाना तुम .....
नीला नीला अम्बर हो जब धीरे धीरे तब आया कर आउंगा रातों में मिलने कह कर तू ये मत जाया कर यादों से तेरी जिन्दा हूँ यादों में तू आ जाया कर वादा करके मत भूला कर अक्सर मुझको याद किया कर ऐसा होता तो वो होता मुझको तू मत बहलाया कर *****नीता परिहार *****
वसुंधरा इतने दिवस से धरे हुए थी धीर बादल,बरसे खोल दिल होकर आज अधीर..
रुत भी गाने लगी राग हुआ मल्लार खिल उठी साँझ है बहने लगी समीर कोकिल स्वर गूंज रहे ,मेघ गरजे आज मन ख़ुशी से झूम उठा करे मयूर पुकार धरती ने पायी हरियाली ,पोखे भरे नीर सावन की बौछार से भर गए नदिया तीर