सावन आयो
वसुंधरा इतने दिवस से धरे हुए थी धीर
बादल,बरसे खोल दिल होकर आज अधीर..
रुत भी गाने लगी राग हुआ मल्लार
खिल उठी साँझ है बहने लगी समीर
कोकिल स्वर गूंज रहे ,मेघ गरजे आज
मन ख़ुशी से झूम उठा करे मयूर पुकार
धरती ने पायी हरियाली ,पोखे भरे नीर
सावन की बौछार से भर गए नदिया तीर
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