
मेरी है न तेरी है
है गरीबी की कहानी
सपनों में पल रही ख्वाइशे
आकाश में पंख फैला
चाह रही थी उड़ना
पर जो था शेष
होना था वही
भाग्य ने अपना काम किया
हालत के आगे
जीने को मजबूर किया
खुरचन पर पल रही थी
जिंदगी एक नही दो
दिन भर की मेहनत
और मिलना दो निवाले
बोनस में थी गालियाँ.
त्रासदी में जब्त भावनाएं
कब होंगी आज़ाद
जाने कब हालात
होंगे तुम्हारे साथ
उठा कर सर जी सकोगे
सम्मान के साथ ...
*****नीता परिहार *****
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