एक कदम बचपन की ओर
बचपन भी भला
कोई भुला है
हंसी यादों का
ये मेला है
रोज़ रात एक
दादी की कहानी
एक था राजा
एक थी रानी
वो चंदा मामा
दूर के
पुए पकाए
गुड के
सप्तऋषि तारे
सूत कातती बुढ़िया
भला कौन
भूला है
जी किया जब भी
अब भी यादों में
बचपन में
चली जाती हूँ
चार लम्हे ख़ुशी
के अपनों के संग
बिता आती हूँ
वो अल्हड बचपन
न कोई गिला
न शिकवा
मस्ती में जिए
जाते है ...........
चलो फिर एक कदम बचपन की ओर
चले जाते है
*****नीता परिहार *****
बचपन भी भला
कोई भुला है
हंसी यादों का
ये मेला है
रोज़ रात एक
दादी की कहानी
एक था राजा
एक थी रानी
वो चंदा मामा
दूर के
पुए पकाए
गुड के
सप्तऋषि तारे
सूत कातती बुढ़िया
भला कौन
भूला है
जी किया जब भी
अब भी यादों में
बचपन में
चली जाती हूँ
चार लम्हे ख़ुशी
के अपनों के संग
बिता आती हूँ
वो अल्हड बचपन
न कोई गिला
न शिकवा
मस्ती में जिए
जाते है ...........
चलो फिर एक कदम बचपन की ओर
चले जाते है
*****नीता परिहार *****

No comments:
Post a Comment