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Friday, 30 May 2014

बरसात
















क्यूँ चले आये बादल बरसते हुए
याद आयेंगे अब पल गुजरते हुए

रात है महकी महकी हुई सी अभी
बिछ गये फूल राहों में झरते हुए

बह गई बूँदें पलकों पे ठहरी हुई
बारिशे हुई यूँ  कुछ लरजते हुए

बहकी बहकी सी बातें हुई रात भर
सुबह भी हो गई फिर चहकते  हुए

पी निगाहों से थोड़ी सी मय झूम के
घर चली आई नीता बहकते हुए ..............


*****नीता परिहार *****






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