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Tuesday, 23 October 2012

ये दिल

सुरमई शाम से आज

ना जाने क्यूं  घबराता है 

ये दिल 

ना जाने क्यूं यादों में

तेरी तडपाता  है

ये दिल

जब भी आँखों में नींद

नही होती रातों में

तेरी ही यादों में भटकाता है

ये दिल

तू दूर ही सही

पर है तो मेरा

जिसे देख खुश हो जाता है

ये दिल

पाकर तुझे सामने

झूमकर गाता है

ये दिल

जाने क्या ऐसा है तुझमे

तुझे पा कर इतराता है

ये दिल ...
              *नीता परिहार *





Sunday, 14 October 2012

बुलाता है कोई


















ऊँचे घने जंगलों में

नीला आसमान ..........

मुश्किल से ही कहीं

 चिथड़ो में ही दिखाई

देता है

हरे भरे जंगल में

पत्तों की आह्ट से

लगता है

बुलाता है कोई

दूर उन दिशाओ से

हवाओ में

 घुली है नमी

बहते झरनों सी

आवाज़ में

 बुलाता है कोई

फूलों में

भंवरों की गुंजन से

हर पल हर दम

बुलाता है कोई .......

                       *नीता परिहार *











Tuesday, 9 October 2012

एक रोशनी













समझ नही आता

क्या संबोधन दूँ

सखा कहूँ  या देवदूत

गुरुदेव कहूँ या देव

लेकर आये जीवन में मेरे

रोशनी की एक सुन्दर चादर

मुस्कराहट दी

 और दी जीने की चाहत

गुज़र गये  मौसम बुरे

और रोशनी  ने आकार लिया

दी जीने की राह नयी

और जीवन से प्यार हुआ

दिया  सुन्दर सा ध्येय मुझे

जिये  अपने लिए तो

क्या जिये

दूसरों के लिए जिओ  तो

तो कोई बात बने .....
                                 *जय गुरुदेव *
                       
*नीता परिहार *




अमृत कलश


बचपन की पुरवैया बीती

तरुणाई लेती अंगड़ाई

पलक पाँवड़े रही बिछाई

 दूर कहीं  गूंजी शहनाई

आशाओं ने करवट बदली

आशीषों का लगा मुहूरत

जीवन जैसे .....

अमृत कलश हो गया ....
                                 *नीता परिहार *






ना जाने क्यू इस दिल ने कहा....

ना जाने क्यू इस दिल ने कहा




जब जब हवा चलती  है

जिन्दगी न जाने

कितनी करवटें

बदलती है

आँगन में गिरे सूखे पत्तों में

जब भी सरसराहट होती है

सीढ़ियों पर जब

चढ़ने की आहट

होती है .......

बरबस ही उस ओर

मन चला जाता है

जानती हूँ कोई

दिल में कोई आस नही

दरवाजे पर जब  होती

खटखटाहट है,फिर भी

उम्मीद से दरवाजा खोलती हूँ

मायूसी ही हाथ होती है

जिन्दगी के ये

उतार चढ़ाव

कभी गम की सर्द हवा

देती है

तो कभी नर्म हवाएं

दोस्त भी बन जाती है

मौसम कभी ठहरता नही

आज पतझड़ है तो

 कल बसंत भी आएगा.......

                                  *नीता परिहार *

Monday, 1 October 2012

तुम जो मिले मुझे

तुम जो मिले मुझे

सारा आसमां मेरा हो गया

चाँद मेरा हो गया

तारे मेरे हो गए

ये फुल पत्ती बाग़ भंवरे

सारे मेरे हो गए

बादलों की बारिशें मेरी हो गयीं

और फिर

इन्द्रधनुष के सतरंगी फुहारों से

मैं सात रंगों में खिल उठी.....
                                              *नीता परिहार *