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Monday, 30 June 2014

था जो शेष



मेरी है न तेरी है
है गरीबी की कहानी
सपनों में पल रही ख्वाइशे
आकाश में पंख फैला
चाह रही थी उड़ना
 पर जो था शेष
 होना था वही
भाग्य ने अपना काम किया
हालत के आगे
जीने को मजबूर किया
खुरचन  पर पल रही थी
जिंदगी एक नही दो
दिन भर की मेहनत
और मिलना दो निवाले
बोनस में थी गालियाँ.
त्रासदी में जब्त भावनाएं
कब होंगी आज़ाद
जाने कब हालात
 होंगे तुम्हारे साथ
उठा कर सर जी सकोगे
सम्मान के साथ ...
*****नीता परिहार *****

Sunday, 1 June 2014

एक कदम बचपन की ओर

 एक कदम बचपन की ओर











बचपन भी भला
कोई भुला है
हंसी यादों का
ये मेला है


रोज़ रात एक
दादी की कहानी
एक था राजा
एक  थी रानी

वो चंदा मामा
दूर के
पुए  पकाए
गुड के

सप्तऋषि तारे
सूत कातती बुढ़िया
भला कौन
भूला है

 जी किया जब भी
अब भी यादों में
 बचपन में
चली जाती हूँ

चार लम्हे ख़ुशी
के अपनों के संग
बिता आती हूँ

वो अल्हड बचपन
न कोई गिला
न शिकवा
मस्ती में जिए
जाते है ...........
चलो फिर  एक कदम बचपन की ओर
चले जाते है
*****नीता परिहार *****