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Thursday, 6 December 2012

स्मृतियाँ



झरोखों से



















जब कभी,तुम्हारा मन बहुत उदास हो

किसी शाम की तुम्हें तलाश हो,

जब कभी हवा जानी सी लगे !

फिज़ाओं में बिखरी खुशबू,

पहचानी सी लगे !

आसमान झुककर कुछ कानों में कहे,

ढलती शाम में कुछ बात हो !

समन्दर में,नज़र आता जब चाँद हो,

रौशनी  में भीगी रात हो !

चाहे क्यूँ  ना ,बादल बैचेन होकर बरसे

मन तुम्हारा भी, भीगने तो तरसे,

मगर तुम चाहो ना चाहो

मैं  याद आ ही जाउंगी  !! ..........
   
                        *नीता परिहार *          

Sunday, 2 December 2012

चिनिया रानी




मेरे घर आँगन आई जब  बिटिया रानी

देखते ही जी किया ,नाम रख दूँ, चिनिया रानी !

वो सजाना संवारना ,काजल का टीका लगाना

गोदी के हिंडोले में झुलाकर सुलाना,

वो उंगुली पकड़कर चलना सिखाना!

घर के दरवाजे पर बैठ, वो इंतज़ार करवाना

पापा के साथ रोज़ शाम ,स्कूटर पर  चक्कर लगाना!

वो पापा के पैरों पर खड़े हो झूला झुलाना,

मनगढ़ंत कहानी सुन सवालो का करना !

नर्सरी की कविताओ को तुतलाकर सुनाना

कॉलेज की बातों को घंटों फोन पर बताना !

दिनो  को जैसे हवा  के पंख लग जाना

कहीं से उसके सपनों के ,राजकुमार का आना !

और ये कहना ,अम्मा बड़ी हो गई बिटिया रानी

ब्याह दे मुझ संग तेरी चिनिया रानी !

खुशियों से अँखियाँ भर आई

पर दिल ही दिल बहुत घबराई

कैसे रह पाऊँगी उसके बिन

पापा की दुलारी ,मेरी प्यारी बिटिया रानी

नाम रखा जिसका चिनिया रानी ....!!!  

                                            ** नीता परिहार **

Tuesday, 23 October 2012

ये दिल

सुरमई शाम से आज

ना जाने क्यूं  घबराता है 

ये दिल 

ना जाने क्यूं यादों में

तेरी तडपाता  है

ये दिल

जब भी आँखों में नींद

नही होती रातों में

तेरी ही यादों में भटकाता है

ये दिल

तू दूर ही सही

पर है तो मेरा

जिसे देख खुश हो जाता है

ये दिल

पाकर तुझे सामने

झूमकर गाता है

ये दिल

जाने क्या ऐसा है तुझमे

तुझे पा कर इतराता है

ये दिल ...
              *नीता परिहार *





Sunday, 14 October 2012

बुलाता है कोई


















ऊँचे घने जंगलों में

नीला आसमान ..........

मुश्किल से ही कहीं

 चिथड़ो में ही दिखाई

देता है

हरे भरे जंगल में

पत्तों की आह्ट से

लगता है

बुलाता है कोई

दूर उन दिशाओ से

हवाओ में

 घुली है नमी

बहते झरनों सी

आवाज़ में

 बुलाता है कोई

फूलों में

भंवरों की गुंजन से

हर पल हर दम

बुलाता है कोई .......

                       *नीता परिहार *











Tuesday, 9 October 2012

एक रोशनी













समझ नही आता

क्या संबोधन दूँ

सखा कहूँ  या देवदूत

गुरुदेव कहूँ या देव

लेकर आये जीवन में मेरे

रोशनी की एक सुन्दर चादर

मुस्कराहट दी

 और दी जीने की चाहत

गुज़र गये  मौसम बुरे

और रोशनी  ने आकार लिया

दी जीने की राह नयी

और जीवन से प्यार हुआ

दिया  सुन्दर सा ध्येय मुझे

जिये  अपने लिए तो

क्या जिये

दूसरों के लिए जिओ  तो

तो कोई बात बने .....
                                 *जय गुरुदेव *
                       
*नीता परिहार *




अमृत कलश


बचपन की पुरवैया बीती

तरुणाई लेती अंगड़ाई

पलक पाँवड़े रही बिछाई

 दूर कहीं  गूंजी शहनाई

आशाओं ने करवट बदली

आशीषों का लगा मुहूरत

जीवन जैसे .....

अमृत कलश हो गया ....
                                 *नीता परिहार *






ना जाने क्यू इस दिल ने कहा....

ना जाने क्यू इस दिल ने कहा




जब जब हवा चलती  है

जिन्दगी न जाने

कितनी करवटें

बदलती है

आँगन में गिरे सूखे पत्तों में

जब भी सरसराहट होती है

सीढ़ियों पर जब

चढ़ने की आहट

होती है .......

बरबस ही उस ओर

मन चला जाता है

जानती हूँ कोई

दिल में कोई आस नही

दरवाजे पर जब  होती

खटखटाहट है,फिर भी

उम्मीद से दरवाजा खोलती हूँ

मायूसी ही हाथ होती है

जिन्दगी के ये

उतार चढ़ाव

कभी गम की सर्द हवा

देती है

तो कभी नर्म हवाएं

दोस्त भी बन जाती है

मौसम कभी ठहरता नही

आज पतझड़ है तो

 कल बसंत भी आएगा.......

                                  *नीता परिहार *

Monday, 1 October 2012

तुम जो मिले मुझे

तुम जो मिले मुझे

सारा आसमां मेरा हो गया

चाँद मेरा हो गया

तारे मेरे हो गए

ये फुल पत्ती बाग़ भंवरे

सारे मेरे हो गए

बादलों की बारिशें मेरी हो गयीं

और फिर

इन्द्रधनुष के सतरंगी फुहारों से

मैं सात रंगों में खिल उठी.....
                                              *नीता परिहार *




Sunday, 30 September 2012

उड़ना है मुझे





तोड़ परम्परा की जंजीरे

और ये बंधन सारे

मेरा भी आज उड़ने

को जी चाहता है

अब न कहो कोई अबला

न कहो देवी

प्रचंड अग्नि बन

जलने को जी चाहता है

नही मै कोई वस्तु

घर को सजाने की

उड़ कर आकाश छू लू

मेरा जोश चाहता है

न कहो कमजोर नारी मुझे

हर शिखर चूमने को

मन मस्त चाहता है

नही मै कोई काठ की गुडिया

नित नई डगर पर चलूँ

मेरा हर हौसला चाहता है ...
                                       *नीता परिहार *

मेरी सखियाँ मेरी दुनियां

मेरी सखियाँ मेरी दुनिया

कैसे जियूं मैं इनके बिना

किरण से बात करूँ न जब तक

जी कहीं नही लगता है

चंचल की चंचलता से

मन प्रफुलित रहता है

माधवी ,शशि,मृदु स्नेह ,स्मिता

इनके बिना न एक पल  बीता

चार्वी  सरोज ,हेमलता

खुशियाँ देती है सदा

कभी कभी ये सोचती हूँ मै

गर ये नही होती जिन्दगी में

जिन्दगी होती एक अँधा कुआं

मेरी सखियाँ मेरी दुनियां।।।।।।।।

                                 *नीता परिहार *

पुनर्जन्म एक बेटी का
















बाबुल के अँगना

जब जन्म लिया मैंने

वो तुतलाना ,वो ऊँगली

पकड़कर चलना मेरा

वो झूठमूठ का खाना पकाना

वो गुड्डा गुडिया का ब्याह रचाना

वो प्यार दुलार

वो मनुहार

जाने कब

बड़ी हो गई मै

छोड़ बाबुल का घर

आई जब दुसरे के अंगना

मिले मुझे फिर

माँ और बाबा

मिला प्यार और दुलार

भरपूर तुम्हारा

तब लगा मुझे जैसे

पुनर्जन्म हुआ मेरा

बेटी की किलकारी से

गूंजा घर और आँगन

नवजीवन के साथ ही

फिर पुनर्जन्म हुआ मेरा

कब मै 25 की हो गई

पता ही नही चला मुझे

बेटियों का पुनर्जन्म होता

रहेगा बार बार हर बार ...

पुनर्जन्म एक बेटी का

                                 *नीता परिहार *

Friday, 28 September 2012

सर्द मौसम














हलकी सी ठंडक लिये

सर्द मौसम ने 

आज दस्तक दी 

 दरवाजा खोला तो देखा 

हरसिंगार के फूल 

 स्वागत में

आँगन में 

बिछे हुए थे

हरसिंगार की महक से

तुम कब दबे पाँव

इन्द्रधनुषी सपनो की

फुहार लिए

आ गये

मुझे पता ही नही चला ......
                                  *नीता परिहार *

Friday, 21 September 2012

पुरानी यादें

बीती रात जब ,दस्तक दी बारिश ने

वो यादों का ताज़ा होकर आना

आँगन का  वो  बिछौना 

दादा के बिछौने के पास एक ही फैन का होना 

हम बच्चो का बिस्तर पर पानी के छीटों का लगाना 

लुका छिपी  या अन्ताक्षरी खेलना 

याद आना इस बात का कि दादा जी 

कब आये और तरबूज औ' खरबूज

एक साथ बैठ सब मिलजुल कर खाना 

वो बारिश की बूंदों का मच्छरदानी के अन्दर

 फुहार बन कर आना,हम बच्चो का खिल जाना 

और फिर बड़ों की फटकार उठो उठो की सुनना 

वो बत्ती का गुल होना ,मच्छर से परेशान  होना 

इसी कशमकश में सुबह हो जाना 

और तैयार हो जाना ,अपनी  फौज के साथ 

मोगरे के फूल चुराना और अमराई जाना 

अब तो आँगन रहे ना अमराई फ्लैट की चाहरदीवारी में बंद 

कंप्यूटर पर ही बागवानी ,व सब्जी उगाना 

सिमट कर रह गई जिन्दगी

इस अजीब दुनिया की आपाधापी में .....

            नीता परिहार 



बीती रात



बीती रात जब तुम
हौले हौले  से
चुपके चुपके से

मुस्काते हुए

मिट्टी की
सोंधी सोंधी सी
भीनी भीनी सी


खुशबू लिए तुम आई

रात खुशनुमा सी
सुबह हुई  न्यारी सी
आसमान नीला सा

और धरती फूलवती !!
                                    *नीता परिहार *


एक वक्त था

एक वक्त था जब

वो कहते थे

कभी आस पास रहा करो

एक झलक दिख जाया करो

इस कदर क्यों देख रहे हो

मुझको

मै तुम्हारा हूँ

तसल्ली रखो

अब कहते हैं

क्या फर्क पड़ता है

दिखो न दिखो

बात करो न करो

मै तुम्हारा हूँ

क्या फर्क पड़ता है

मुझको

मै  तब भी खुश था  और

अब भी खुश हूँ  .......

Saturday, 15 September 2012

मन का आकाश

कल ही तो हुआ

परिचय हमारा

आज खोल दिया

मन का आकाश सारा

मै नही जानती

आखिर तुम्हारे पास

ले आयी मुझे

किसकी दुआएं

मुझे प्यार मिला

भरपूर तुम्हारा ....!
                           *नीता परिहार *

इस दिल ने कहा ...

सूरज तो जैसे ईद का चाँद हो गया
बादलों की साजिश में हलकान हो गया


आज किरण निकली नही ,पुरवाई बही नही
लगता है सूरज की तबियत कुछ ठीक नही


कोयल की कुहू कुहू ,पपीहे की पिहू पिहू
से जब आँख खुली तो देखा
ठंडी बयार बह रही है
बारिश की पहली फुहार से
पता चला की तुम आ गये


                                                       *नीता परिहार *    

तुम जो आये

तुम जो आये जिन्दगी में तो

एक नशा सा छा गया

जैसे महके हरसिंगार का

गुलिस्तां सा आ गया

तेरा प्यार से देखना

जैसे कमल का खिलना

तेरे होठों की हँसी

जैसे हर ख़ुशी का मिलना

और कुछ तो नही बस

वफ़ा का तोहफा लाना

जब भी तुम मिलने आना ....!
                                     Neeta  

Thursday, 13 September 2012

मुझे इंतज़ार है




मुझे इंतज़ार है

हरसिंगार के खिलने का

झर के आँगन में

बिछ जाने का

खुशबू से

आँगन के महकने का

मुझे इंतज़ार है

तुम्हारे आने का

क्योकि मैंने देखा है

जब भी हरसिंगार

खिलकर

मेरे आँगन में

बिखरता है

उसकी खुशबू  से

तुम खिंचे  चले आते हो

इस लिए तो

मुझे इंतज़ार है

हरसिंगार के खिलने का ......
                                  *नीता परिहार *

मुझे जाना कहाँ


जाना है कहाँ

बैठी थी वो
सडक के किनारे
चिथड़ों में
लिपटी हुई
टूटी छतरी लिए
खुद को और
अपने सामान को ,
बारिश से बचाने की
जुगत में उलझी हुई
उसे यूँ जूझते  देख
अनायास ही पूछ बैठी मैं
माई घर नही जाना ?
बोली वो
घर ही तो है ये मेरा
मुझे कहाँ  है जाना
मैंने कहा
खाना कहाँ खाओगी ?
बोली देने वाला है न
मुस्कुराकर बोली
ये तो रोज़ रोज़ का है रोना
फिर क्यों दुखी है होना
यही पर जीती हूँ
यही पर मरना है
मै खुश हूँ इसी हाल में
तू क्यों मेरे लिए परेशां है
सोचने पर मजबूर मैं
रहने को घर नही
खाने का ठिकाना नही
सडक के किनारे
बस रही जिंदगियां
इस हाल में भी खुश
क्या सचमुच ?

                                    *नीता परिहार *

थोड़ी सी बारिश




ये क्या हुआ

थोड़ी  सी बारिश

थोडा सा प्यार

फिर वही गर्मी

दिल बेकरार

जाने कहाँ चला गया

बादलों का डेरा

पीने लगे हम

फिर पेप्सी और कोला ....नीता परिहार 

बांसुरी




राधा

एक दिन

जब इंतज़ार करते हुए

बैचेन हो गई

तो उसने

बाँसुरी से कहा

तुम तो कान्हा के करीब होती हो

होठों को छू लेती हो

तभी इतना इठलाती हो

सुर इतने ह्रदय स्पर्शी

कि दुनिया को मोह लेती हो ...!
                                             *नीता परिहार *

तुम जो मिले

डरी सी

सहमी सी मै

तुमने मुझे

उन्मुक्त होना सीखा दिया

मुझे

पंख फैला

आकाश में

उड़ना सीखा दिया

तुम जो मिले मुझे

अहसासों को

शब्दों में पिरोना

सीखा दिया ...!


सपनों के आँगन में







सपनों के आँगन में

बैठे  बुन रही थी

सपने

तुम आये

और

हौले से

मुस्कुराते हुए कहा

देखो

मै न कहता था

तुम  लिख सकोगी कविता ......!
                                  * नीता *

Wednesday, 12 September 2012

स्तुति - आराध्य की








                                                  
धूप दीप नैवेद्य नहीं है ,धाती का श्रृंगार  नहीं,

हाय गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं,

स्तुति कैसे करूँ तुम्हारी , है स्वर में माधुर्य नहीं,

मन का भाव प्रकट करने को , वाणी में चातुर्य नहीं,

न ही दान है न ही दक्षिणा , खाली हाथ चली आई,

पूजा की विधि नहीं जानती , फिर भी नाथ चली आई,

मै उन्मत  हूँ प्रेम की भूखी, ह्रदय दिखाने आई हूँ,

जो कुछ भी है पास हमारे, उसे चढ़ाने आई हूँ,

चरणों में अर्पित है प्रभुवर, चाहो तो स्वीकार करो,

यह तो वस्तु तुम्हारी ही है, ठुकरा दो या प्यार करो मेरे प्रभु।।