बीती रात जब ,दस्तक दी बारिश ने
लुका छिपी या अन्ताक्षरी खेलना
वो यादों का ताज़ा होकर आना
आँगन का वो बिछौना
आँगन का वो बिछौना
दादा के बिछौने के पास एक ही फैन का होना
हम बच्चो का बिस्तर पर पानी के छीटों का लगाना
लुका छिपी या अन्ताक्षरी खेलना
याद आना इस बात का कि दादा जी
कब आये और तरबूज औ' खरबूज
एक साथ बैठ सब मिलजुल कर खाना
वो बारिश की बूंदों का मच्छरदानी के अन्दर
फुहार बन कर आना,हम बच्चो का खिल जाना
फुहार बन कर आना,हम बच्चो का खिल जाना
और फिर बड़ों की फटकार उठो उठो की सुनना
वो बत्ती का गुल होना ,मच्छर से परेशान होना
इसी कशमकश में सुबह हो जाना
और तैयार हो जाना ,अपनी फौज के साथ
मोगरे के फूल चुराना और अमराई जाना
अब तो आँगन रहे ना अमराई फ्लैट की चाहरदीवारी में बंद
कंप्यूटर पर ही बागवानी ,व सब्जी उगाना
सिमट कर रह गई जिन्दगी
इस अजीब दुनिया की आपाधापी में .....
नीता परिहार
इस अजीब दुनिया की आपाधापी में .....
नीता परिहार
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