बाबुल के अँगना
जब जन्म लिया मैंने
वो तुतलाना ,वो ऊँगली
पकड़कर चलना मेरा
वो झूठमूठ का खाना पकाना
वो गुड्डा गुडिया का ब्याह रचाना
वो प्यार दुलार
वो मनुहार
जाने कब
बड़ी हो गई मै
छोड़ बाबुल का घर
आई जब दुसरे के अंगना
मिले मुझे फिर
माँ और बाबा
मिला प्यार और दुलार
भरपूर तुम्हारा
तब लगा मुझे जैसे
पुनर्जन्म हुआ मेरा
बेटी की किलकारी से
गूंजा घर और आँगन
नवजीवन के साथ ही
फिर पुनर्जन्म हुआ मेरा
कब मै 25 की हो गई
पता ही नही चला मुझे
बेटियों का पुनर्जन्म होता
रहेगा बार बार हर बार ...
पुनर्जन्म एक बेटी का
*नीता परिहार *

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