जाना है कहाँ
बैठी थी वो
सडक के किनारे
चिथड़ों में
लिपटी हुई
टूटी छतरी लिए
खुद को और
अपने सामान को ,
बारिश से बचाने की
जुगत में उलझी हुई
उसे यूँ जूझते देख
अनायास ही पूछ बैठी मैं
माई घर नही जाना ?
बोली वो
घर ही तो है ये मेरा
मुझे कहाँ है जाना
मैंने कहा
खाना कहाँ खाओगी ?
बोली देने वाला है न
मुस्कुराकर बोली
ये तो रोज़ रोज़ का है रोना
फिर क्यों दुखी है होना
यही पर जीती हूँ
यही पर मरना है
मै खुश हूँ इसी हाल में
तू क्यों मेरे लिए परेशां है
सोचने पर मजबूर मैं
रहने को घर नही
खाने का ठिकाना नही
सडक के किनारे
बस रही जिंदगियां
इस हाल में भी खुश
क्या सचमुच ?
*नीता परिहार *
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