तोड़ परम्परा की जंजीरे
और ये बंधन सारे
मेरा भी आज उड़ने
को जी चाहता है
अब न कहो कोई अबला
न कहो देवी
प्रचंड अग्नि बन
जलने को जी चाहता है
नही मै कोई वस्तु
घर को सजाने की
उड़ कर आकाश छू लू
मेरा जोश चाहता है
न कहो कमजोर नारी मुझे
हर शिखर चूमने को
मन मस्त चाहता है
नही मै कोई काठ की गुडिया
नित नई डगर पर चलूँ
मेरा हर हौसला चाहता है ...
*नीता परिहार *


