कल रात
आयी थी
यादों की बारिश
वो आँगन में सोना
संग दादा का बिछौना
घर पर बस तब
एक ही पंखे का होना
कल रात आयी थी
यादों की बारिश
गीत माला सुनना
दादी का लोरी सुनाना
वो भाग कर
लुका छिपी में
मुंडेर पर आना
दोपहरी भर खेलना
चोरी छिपे बैठ कर
इमली खाना और
खरबूजों की
दावतें उड़ाना
वो बारिश की बूंदे
और बहते पानी में
इठलाते हुए
कश्तियाँ चलाना
इठलाते हुए
कश्तियाँ चलाना
कल रात आयी थी
यादों की बारिश
अमराई जाना
फूलों का चुराना
अब आँगन रहे
न अमराई
बचपन को किताबों में
गंवाना ,न रूठना न मनाना
बस अब रह गया यही
जीवन की आपाधापी
जीवन की आपाधापी
सबके हिस्से में आना
किसी के घर आना न जाना .........:)
किसी के घर आना न जाना .........:)
*****नीता परिहार *****

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