ये बरिश की बूंदें जब भी
बरसती है ......
ये आँखे इंतज़ार में तेरे
तरसती है ...........
मन के आंगन में साथ
अपने यादों के मोती
लिए आती है ..........
अश्क जब कोरों में
बूंद बन झिलमिलाते है
विरह में तेरे जिन्दगी
जीने को मजबूर
हुए जाती है .........
ये गुजारिश है तुमसे
अबकी जब तुम जाना
संग अपने ये
सिली यादें भी ले जाना
ले जाना वे सपने भी
जिन्हें देख अब भी अँखियाँ
लरजती है ........
*****नीता परिहार*****

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