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Sunday, 17 November 2013

मुक्तक

                  मुक्तक













मौसम हो गया बदलकर रूमानी
चेहरा हो गया खिलकर नूरानी
था इंतज़ार हमको इनका कब से
लो आई मुस्कुराकर ऋतुओं की रानी
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कल रात स्याह काली और गहरी थी बहुत
ख्वाब में भोर की किरणें सुनहरी थी बहुत
क्या हुआ गर अँधेरे तुम में नजर नहीआये
आँख जब खुली तो पाया नींद प्यारी थी बहुत
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जीवन में आये कुछ यादगार पल
जो बनकर जियेंगे हमेशा सदाबहार पल
सब तेरे रहमतों की रहगुज़र है
की आते रहेंगे हर मौसम खुशगवार पल
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ठन्डे झोंखे आये है उस पार से
खिला है दिल बस उनके प्यार से
यूँ तो मौसम हुआ खुशगवार है
खिला  है नूर  फिजा में बहार से
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चाहती थी पंख फैला उड़ना परिंदा होकर
 मानव रह गया अब सिर्फ दरिंदा होकर
 न पता था बुलबुल बन कैद हो जाउंगी
हिम्मत से बढ़ आगे न जी शर्मिंदा होकर

      *नीता परिहार *
  

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