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Saturday, 30 November 2013

आज फिर दिल किया

आज फिर दिल किया

अतीत के  गलियारे से

होते हुए घर के उस आंगन तक पहुंची

जहाँ मुख्य द्वार तक जाने है रास्ता

दोनों ओर बनी है बड़ी बड़ी क्यारियाँ

जहाँ रोपे  है फूलों के कुछ बीज नये

गुलदावदी ,पीली ,सफेद ,मेंहरुन

भीनी भीनी महक लिए खिली है बेसुमार

गेंदे के फूलों की जैसे लगी है भरमार

डहलिया ,और गुलाब की आई है बहार

सूरजमुखी तो जैसे इंतज़ार है नवदिन का

माँ की आवाज़ सुन गलियारे से बाहर आई

बड़ा ही दुखद रहा जाना वहां

आज जब रूककर देखती हूँ

तो कुछ भी नही रहा यहाँ

आँगन तो अब रहा नही

बड़ा सा पक्का मकान बन गया

घर में रहने के लिए अब नही कोई

संयुक्त परिवार एकल हो गया

और हम सब हो गये अकेले  .............नीता






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