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Sunday, 2 November 2014

माँ



दिन-रात परवरिश,

करने वाली *माँ*

कहाँ वह अपनी,

देखभाल  कर पाती है /

इंतज़ार में बच्चों के,

आँखे पथरा जाती है/

सुन कोई एक आवाज़,

दौड़ दरवाज़े तक आती है/

देतीं है दुआएं हर-पल ,

खुश है बच्चे सोच ,

आत्म संतुष्टी पाती है /

कर स्रष्टि का सृजन

संसार की भीड़ में वो

खुद को अकेला पाती है!!

*****नीता परिहार *****



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