दिन-रात परवरिश,
करने वाली *माँ*
कहाँ वह अपनी,
देखभाल कर पाती है /
इंतज़ार में बच्चों के,
आँखे पथरा जाती है/
सुन कोई एक आवाज़,
दौड़ दरवाज़े तक आती है/
देतीं है दुआएं हर-पल ,
खुश है बच्चे सोच ,
आत्म संतुष्टी पाती है /
कर स्रष्टि का सृजन
संसार की भीड़ में वो
खुद को अकेला पाती है!!
*****नीता परिहार *****
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