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Monday, 27 October 2014

रिश्तों की भीड़ में ,

खुद को भुला दिया !

जा चुके थे लोग ,

देखा ,जब होश

आया हमें !

रिश्तों को बना कर खेल

जुआरी बन बैठे लोग

नफ़ा नुकसान की

बिछा चौपड़ ,

रिश्तों का दाँव लगा बैठे !

हिमाकत बस हमारी

इतनी सी

सोचा ज़रा बस

अपने लिए

अपनों  ने हमें

दुश्मन बना  लिया  !!

*****नीता परिहार *****

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