जब कभी,तुम्हारा मन बहुत उदास हो
किसी शाम की तुम्हें तलाश हो,
जब कभी हवा जानी सी लगे !
फिज़ाओं में बिखरी खुशबू,
पहचानी सी लगे !
आसमान झुककर कुछ कानों में कहे,
ढलती शाम में कुछ बात हो !
समन्दर में,नज़र आता जब चाँद हो,
रौशनी में भीगी रात हो !
चाहे क्यूँ ना ,बादल बैचेन होकर बरसे
मन तुम्हारा भी, भीगने तो तरसे,
मगर तुम चाहो ना चाहो
मैं याद आ ही जाउंगी !! ..........
*नीता परिहार *
