गुजरती हूँ ज़र्ज़र हुए ,
दिल के गलियारे से कभी
जहाँ गुज़ारे थे चंद रोज़ कभी !
मिलते है लम्हात,कुछ बिखरे
तो कुछ संभले हुए,
कुछ मीठे शर्बत हुए
कुछ खारे समन्दर !
मिला एक लम्हा ज़मी पर,
सिसकता सा !
चाहा था उठाना मगर
भारी था रिश्तों पे ,
अहम का जो मारा निकला
टूट कर भी रूहानी रिश्तें ,
दिल में जिंदा रहा करते है !
हर ख़ुशी में, थोड़ी टीस
दिया करते है !
भुला देने की जिद में ,
मशरूफियत में भी
याद रहा करते है !
*****नीता परिहार *****
दिल के गलियारे से कभी
जहाँ गुज़ारे थे चंद रोज़ कभी !
मिलते है लम्हात,कुछ बिखरे
तो कुछ संभले हुए,
कुछ मीठे शर्बत हुए
कुछ खारे समन्दर !
मिला एक लम्हा ज़मी पर,
सिसकता सा !
चाहा था उठाना मगर
भारी था रिश्तों पे ,
अहम का जो मारा निकला
टूट कर भी रूहानी रिश्तें ,
दिल में जिंदा रहा करते है !
हर ख़ुशी में, थोड़ी टीस
दिया करते है !
भुला देने की जिद में ,
मशरूफियत में भी
याद रहा करते है !
*****नीता परिहार *****