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Wednesday, 22 October 2014

रिश्तें

गुजरती हूँ ज़र्ज़र हुए ,

दिल के गलियारे से कभी

जहाँ गुज़ारे थे चंद रोज़ कभी !

मिलते है लम्हात,कुछ बिखरे

तो कुछ संभले हुए,

कुछ मीठे शर्बत हुए

कुछ खारे समन्दर !

मिला एक लम्हा ज़मी पर,

सिसकता सा !

चाहा था उठाना मगर

भारी था रिश्तों पे ,

अहम का जो मारा निकला

टूट कर भी रूहानी रिश्तें ,

दिल में जिंदा रहा करते है !

हर ख़ुशी में, थोड़ी टीस

दिया करते है !

भुला देने की जिद में ,

मशरूफियत में भी

याद रहा करते है !

*****नीता परिहार *****