खामोशियाँ भी बोलती है
दूर होते हुए,
कोलाहलों में भी
मौन की गूंज
अल्फाजों में सुनाई देती है,
तुम्हारी उदासी को,
ख़ुशी को,मौसम से
हमेशा बातें करते सुना
दिल की बातें दिल तक
पहुंचकर ही शुकून
पातीं हैं.……
देखो,चलीं बसंती हवाएं
चारों तरफ खिले
"नारंगी पलाश "
अभी अभी
तुम्हें कहते सुना
लग रहा न जंगल में
आग लगी।
*****नीता परिहार *****
१६ /२ /२०१५