सुनो, तरक्की की राह
पर बढ़ते चले
जाना तुम !
हर रोज़ इबादत में उसकी
एक दिया जरुर
जलाना तुम !
उन्नति के मद में
कहीं मगरूर न हो
जाना तुम!
भुला कर मुझको
मसरूफियत में अपनी
खुद को भी भूल न
जाना तुम !
बढ़ते कदम थक कर
थम जाएँ कभी
बस एक बार याद
मुझको कर लेना तुम !
*****नीता परिहार *****