जब कभी,तुम्हारा मन बहुत उदास हो
किसी शाम की तुम्हें तलाश हो,
जब कभी हवा जानी सी लगे !
फिज़ाओं में बिखरी खुशबू,
पहचानी सी लगे !
आसमान झुककर कुछ कानों में कहे,
ढलती शाम में कुछ बात हो !
समन्दर में,नज़र आता जब चाँद हो,
रौशनी में भीगी रात हो !
चाहे क्यूँ ना ,बादल बैचेन होकर बरसे
मन तुम्हारा भी, भीगने तो तरसे,
मगर तुम चाहो ना चाहो
मैं याद आ ही जाउंगी !! ..........
*नीता परिहार *

नीता जी, आपकी पंक्तियों में जो आकांक्षा अभिव्यक्त है उसमें जो एक दृढ़ता और एकतानता है वह प्रभावित करती है । मैं पाता हूँ कि यह आकांक्षा निश्चय ही एक बड़ी दृष्टि से पुष्ट होती और अपना सर्जनात्मक संबल पाती है ।
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आपका 🙏
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