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Thursday, 6 December 2012

झरोखों से



















जब कभी,तुम्हारा मन बहुत उदास हो

किसी शाम की तुम्हें तलाश हो,

जब कभी हवा जानी सी लगे !

फिज़ाओं में बिखरी खुशबू,

पहचानी सी लगे !

आसमान झुककर कुछ कानों में कहे,

ढलती शाम में कुछ बात हो !

समन्दर में,नज़र आता जब चाँद हो,

रौशनी  में भीगी रात हो !

चाहे क्यूँ  ना ,बादल बैचेन होकर बरसे

मन तुम्हारा भी, भीगने तो तरसे,

मगर तुम चाहो ना चाहो

मैं  याद आ ही जाउंगी  !! ..........
   
                        *नीता परिहार *          

2 comments:

  1. नीता जी, आपकी पंक्तियों में जो आकांक्षा अभिव्यक्त है उसमें जो एक दृढ़ता और एकतानता है वह प्रभावित करती है । मैं पाता हूँ कि यह आकांक्षा निश्चय ही एक बड़ी दृष्टि से पुष्ट होती और अपना सर्जनात्मक संबल पाती है ।

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद आपका 🙏

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