नूर फिर से फिज़ा में बिखरने लगा
संग चलने को दिल मचलने लगा
घुल गये तराने हवाओं में फिर
लुत्फ़ हमको तसव्वुर में मिलने लगा
ख्वाब शबनम से कुछ झिलमिलाने लगे
रंग महफ़िल में उल्फत का खिलने लगा
आज की शब खिले फूल गुलशन में जो
गुफ्तगू दिल मेरा उन से करने लगा
फिर परिंदे चहकने लगे शाख पर
संग उड़ने को मन मेरा करने लगा ......:)
.....*नीता परिहार *

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