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Tuesday, 1 October 2013

कुछ मेरी कलम से















नूर फिर से फिज़ा में बिखरने लगा
संग चलने को दिल मचलने लगा

घुल गये तराने हवाओं में फिर
लुत्फ़ हमको तसव्वुर में मिलने लगा

ख्वाब शबनम से कुछ झिलमिलाने लगे
 रंग महफ़िल में उल्फत का खिलने लगा

आज की शब खिले फूल गुलशन में जो
 गुफ्तगू दिल मेरा उन से करने लगा

फिर परिंदे चहकने लगे शाख पर
संग  उड़ने को मन मेरा करने लगा ......:)


.....*नीता परिहार * 

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