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Sunday, 23 March 2014

चंद हायकू

किसान















सूखे है खेत
बंज़र है जमीन 
बहते आंसू 

खेत जोतता 
थक गया किसान 
चारा न पानी

क़र्ज़ में डूबा 
बंधाई थी उम्मीद 
वादा मुकरा 

ये न करना 
ख़ुदकुशी है पाप
हौसला रख

जागो किसान
लड़ो हक के लिए
बदलो सोच 

घिरे बादल 
हरसाई जमीन 
आई बारिश 

कीचड़ हुआ
खेत जोते किसान
रोपे  है बीज

फसल उगी
लहलहाए खेत
खिला चेहरा

दौड़ते बैल
गले में है घंटियाँ
आई खुशियाँ

हुआ विकास
किसान खुशहाल
देश समृद्ध ............
***नीता परिहार ***






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